Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 26, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
निर्वाणस्योपशान्तस्य ज्ञस्य सोदेति शीतता ।
अन्तर्यत्रेन्दवोऽप्येते दीप्तज्वलनबिन्दवः ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार जयत् के स्वरूप को जान रहे ज्ञानी को सांसारिक सन्ताय की प्राप्ति कभी नहीं
होती, यह कहते हैं ।
सभी तरह के विकारों से निर्मुक्त अतएव परमशान्त ज्ञानी पुरुष के अन्दर ऐसी सबसे उत्तम
शीतलता उत्पन्न हो जाती है, जिसकी तुलना में ये अनेक चन्द्रमा भी प्रदीप्त अग्नि के कणों के
सदृश प्रतीत होने लगते हैं