Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 26, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 26, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
ज्ञ एवापगतस्वान्तं शान्तमास्व महाश्मवत् ।
असौ न मननं मानमनन्तमजमव्ययम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
अस्नली बात यह है कि वह सब रूप केवल मन की कल्पना है, अतः मनके शान्त हो जानेपर
वह स्वयं अपने-आप विलीन हो जाता है, इसलिए ठुम चुपचाप बैठे रहो, यह कहते हैं।
जैसे बड़ा पत्थर अपने स्थान में चुपचाप शान्तिपूर्वक बैठा रहता है, वैसे ही तुम भी मन को हटाकर
चुपचाप शान्तिपूर्वक अपने प्रमातारूप में स्थित रहो। मन के चले जाने पर प्रमातारूप आत्मा नहीं
चला जाता, क्योकि उस मन के चले जाने पर नामरूपात्मक मनन (विकल्प) एवं चक्षु आदि प्रमाण
चले जाते हैं, परंतु प्रमातारूप आत्मा न मनन है और न चक्षु आदि प्रमाणरूप ही है, वह तो असीम,
अज ओर अविनाशी ब्रह्मरूप है