Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 27, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
उद्यति प्रतिपच्चन्द्रे वहति प्रलयानिले ।
आत्मतत्त्वं समं सौम्यं न क्षुभ्यति न शाम्यति ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
सकस विशेष तो यह है कि जान निविकारी है यह कहते है /
जैसे प्रतिपदा के चन्द्रमा के उदित होने पर समुद्र क्षुब्ध होता है ओर जैसे प्रलयकाल की वायु
बहने पर समुद्र सूख जाता है, वैसे आत्मतत्त्व न क्षुब्ध होता है ओर न सूख जाता है, वह सदा
एकरूप और सौम्य रहता है