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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 27, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 27, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

एवं निश्चयवान्नाम त्वमेवासि निरञ्जनः । ध्याता ध्येयं तथा ध्यानं सत्यं चापि न किंचन ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

उसका क्या फल है इस पर कहते हैं । इस प्रकार के निश्चय से युक्त हुए आप ही अज्ञानरूप बन्धन से निर्मुक्त निरंजन हैं | उक्त निश्चय ध्याता, ध्यान और ध्येय से शून्य ( त्रिपुटीशून्य) है, त्रिकाल में बाधित होनेवाला नहीं है। ध्याता, ध्यान और ध्येय-इनमें कोई भी सत्य नहीं है यानी त्रिकालाबाधित नहीं है