Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 29, Verse 68
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 29, verse 68 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 68
संस्कृत श्लोक
समग्रकरणग्रामोऽप्यसंकल्पो विवेदनः ।
न किंचिदप्यनुभवत्यन्तर्बाह्ये च शान्तधीः ॥ ६८ ॥
हिन्दी अर्थ
तब जीवन्युक्तों की मुक्तता ही न रही, क्योकि उन्हें वक्ष आदि इन्द्रियों से बाह्य पदार्थों का
विज्ञान होता हैं, यही द्रष्ट है, इस पर कहते हैं /
जो तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त पुरुष है उसकी समस्त इन्द्रियाँ हैं पर वे संकल्पशून्य हैं और सविकल्प
ज्ञान से रहित हैं । इसलिए शान्तबुद्धि यह महात्मा बाह्य ओर आन्तर किसीका अनुभव नहीं
करता