Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 3, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
अचेतनादनन्तात्मा भूत्वा ज्ञोऽप्युपलोपमः ।
संसारमूलकषणं कुरु क्रोडमुखाग्रवत् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
यह नहीं प्रमञझना चाहिये कि विदाभास के उच्छेद से जीव का स्वरूप नष्ट हो यया, किन्तु
उसने तो ब्रह्मस्वरुप से अनन्तात्मा होकर अपने अनर्थरृप संसार का यूलोच्छेद कर परम पुरुषार्थ
का सम्पादन कर लिया, यह कहते हैं ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, चिदाभासात्मक क्रिया का उच्छेद करके पत्थर के समान निश्चल अनन्त
परब्रह्म परमात्मरूप होकर संसार के मूल को ऐसे उखाड़ फेंकिये, जैसे वराह के मुख का अग्रभाग
मोथा को समूल उखाड़ फेंकता है