Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 3, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
यदा तदैव सुकरं वेदनावेदनं स्वयम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
(यद्यपि विद्योन्युखत्वं संत्यज्य' इत्यादि से अवेदन शब्दार्थ का।निरुपण हो जाने से श्रीरामभद्र
को यह शंका नहीं होनी चाहिए. तथापि येन सविदसंवित्या“ उस कथन से केदन नाश ही असवेदन
कहा यया है यह बात (तच्छान्तं ब्रह्म कथ्यते“ इस वाक्य द्वारा प्रतिपादित अवेदन की ब्रह्मरूपता
नहीं घटती, क्योकि सत् असत् नहीं हो सकता; इसलिए शंका का अक्सर हैं ८)
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, जिस समय यह सिद्धान्त मान लिया जाय कि असत् वस्तु
की उत्पत्ति और सद्वस्तु का विनाश नहीं होता, उस दशा में वेदन को अवेदन बनाना स्वयं ही
सुलभ हो जाता है