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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 3, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

रसे निर्वासने लब्धे रसा अप्यतिनीरसाः । नान्तस्तिष्ठन्ति न बहिरज्ञाननिपुणा इव ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे नदी के प्रवाह में पतित तृण, काष्ठ आदि सब कुछ स्पन्दित होता है । वैसे ही ज्ञानियों की कर्मेन्द्रियाँ किसी प्रकार के मनोविकार के बिना अर्धसुप्त या बालक की नाई स्पन्दित होती हैं २१॥ सबसे बढ़े-चढ़े ब्रह्मानंद के प्राप्त हो जाने पर भोगलम्पट करणवृत्तियाँ भी नीरस होकर अपने-अपने विषयों के प्रकाशन में असमर्थ -सी बनकर भीतर या बाहर कुछ भी नहीं कर पाती