Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 3, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 3, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 3 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
बुद्धीन्द्रियेहितं कर्म सफलं रसभावनात् ।
वेष्टितव्यं कुदाम्नेव स्पन्दोऽन्यो निष्फलोऽङ्गजः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
चेष्टारूप स्पन्द भी निष्फल है