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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 30, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 30, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

निर्वाणैकतया ज्ञस्य वासनैव न वासना । लेखादामोपमा त्वब्धेरूर्म्यादि न जलेतरत् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

जो ज्ञानी पुरुष है उसकी वासना वासना ही नहीं है, क्योंकि वह निर्वाण स्वरूप बन गया है । जैसे जले हुए वस्त्र मेँ तन्तुओं की रेखाएँ प्रतीत होती हैं, परन्तु असल में तन्तुओं की रेखाएँ हैं ही नहीं, वैसे ही व्यवहार से ज्ञानी में अनुमित वासना बाधित होने के कारण वासनारूप नहीं है । जैसे समुद्र के तरंग जल से अन्य कुछ नहीं हैं वैसे ही परमात्मा से इतर कुछ भी नहीं है