Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 31, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अनालोकनसिद्धं यत्तदालोकान्न विद्यते ।
कृष्णाद्यनुपलम्भोऽत्र दृष्टान्तः स्पष्टचेष्टितः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस पदार्थ की प्रतीति प्रकाश की अस्फूर्ति से सिद्ध है यानी प्रकाश
के बिना जिस पदार्थ की प्रतीति होती है वह पदार्थ प्रकाश से विद्यमान नहीं रहता। इस विषय
में बिलकुल स्पष्ट दृष्टान्त तो प्रकाश की उपस्थिति में अन्धकार और उसमें अपना काम
करनेवाले चोर आदि की उपलब्धि का अभाव ही है