Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 31, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
तदेवाभ्यासतः पूर्वं बाह्यार्थानुभवात्मना ।
स्फुरतीव बहिष्ट्वेन स्वस्वप्नोऽत्र निदर्शनम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
वही बाह्य पदार्थों के अनुभवरूप से दृढ़ अभ्यास होने के पहले बाहर में जगत् के रूप से मानों
स्फुरित होता है, इस विषय में अपना स्वप्न ही दृष्टान्त है