Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 31, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
स्थैर्यास्थैर्ये तथैवात्र भ्रान्तिमात्रमये तते ।
आधाराधेयते ते द्वे यथा जलतरङ्गते ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
जाग्रत और स्वप्नावस्था के पदार्थों में स्थिरता और चंचलतारूप भेद तो प्रत्यक्ष ही उपलब्ध
होता है उसकी क्या दशा होगी, यदि यह आशंका करें. तो उस एर कहते हैं ।
एवं जाग्रदवस्था के पदार्थों में स्थिरता तथा स्वाप्निक पदार्थों में जो अस्थिरता प्रतीत होती है
वह भी एकमात्र विस्तृत भ्रान्ति ही है तथा जाग्रतकालीन शरीर में आधारता और स्वप्न में आधेयता
की जो प्रतीति होती है वह भी जल और तरंग के तुल्य ही है