Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 31, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 31, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 31 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
निर्णय एष एवात्र यदशेषमभावयन् ।
यथास्थितं यदाचारं पाषाण इव तिष्ठसि ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
तब क्या वे शास्त्र सक व्यर्थ है 2 इस पर नही" यह कहते है/
स्वाभाविक स्वरूपस्थिति की सिद्धि के लिए असद्रूप होते हुए भी सत् की नाई कल्पना
करके निन्दा आदि के द्वारा शास्त्रों में वैराग्य एवं विवेक से लेकर तत्त्व साक्षात्कार पर्यन्त उपायों
की कल्पना की गई है - यही सब शास्त्रों मेँ निर्णय है, इसलिए हे श्री रामजी, जो ये सब
वस्तुं सत्-सी प्रतीत हो रही हैं, इन्हें सद्रूप से भावना न करते हुए यानी इन्हे आप मिथ्या
समझते हुए शास्त्र और (ज्ञान) सम्प्रदाय के अनुसार भूमिकाओं के क्रम का अभ्यास करके
पाषाण के समान स्थित रहिये