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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 32, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । यदा चितिः प्रसरति तदाहंताजगद्भ्रमः । असदेवाभ्युदेतीव स्पन्दादपि च वायुता ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि मनुष्य के पास विद्या या अविद्या हैं, तो उमप्चके लिए मोक्ष या ससार स्वाधीन है, यह वर्णन करने की उच्छा रखनेवाले महाराज वस्निष्ठजी पहले अविद्या से चित्त का विस्तार ओर फिर उससे स्वाधीन ससार को दिखलाते हे / महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, जब यह चितिशक्ति स्पन्दित होती है, यानी अविद्या से विषयों की ओर झुकने के लिए उसमें हलचल पैदा होती है, तब अहम्भावरूप जगत्‌ का भ्रम उत्पन्न-सा हो जाता है, जो कि असद्रूप ही है । स्पन्दन से भी तो वायुरूपता उत्पन्न-सी हो जाती है, यद्यपि वह कुछ भिन्न नहीं है

सर्ग सन्दर्भ

इकतीसवाँ सर्ग समाप्त बत्तीसवाँ सर्ग साधुओं के समागम और सत्‌ शास्त्रों का विचार करनेवाले पुरुष को मोक्ष अवश्य ही होता है, इसलिए मोक्ष स्वाधीन है, इसका युक्ति पूर्व कथन ।