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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 32, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

रूपानुभवमादत्ते चक्षुःप्रसरणाद्यथा । चितिः प्रसरणात्तद्वज्जगद्विभ्रममास्थिता ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे आँख अपनी चहल-पहल से रूप का अनुभव प्राप्त करती है, वैसे ही चिति चहल-पहल से ही जगत्‌ का भ्रम प्राप्त करती है