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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 32, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 32, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

अयं त्वनुभवादेव मुधैवानुभवन्स्थितः । असदेवाननुभवन्स्वयमर्भकयक्षवत् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

यह जो चिति का बाह्य पदार्थों की ओर प्रसरण है, वह तो अनुभव से ही सिद्ध है, विद्या से जब उसका बाध हो जाता है, तब असत्य अर्थ का पुरुष को अनुभव नहीं होता, उस समय यह अनुभव करता है कि इतने काल तक मैं व्यर्थ ही, बालक जैसे असत्य यक्ष का अनुभव कर स्थित रहता है वैसे ही, असत्‌ अर्थ का अनुभव कर स्थित रहा