Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 33, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
स्वं कल्पितं कल्पितं च प्रतिकल्पनया स्वया ।
तदेवान्यत्वमादत्ते विषत्वममृतं यथा ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
ये जितने कल्पना से बने हुए तथा कल्पना के कारण अविद्या,
वासना आदि अशास्त्रीय पदार्थ हैं, वे सब अपनी शास्त्रीय प्रतिकल्पना से बन्धन हेतुता छोड़कर
मोक्षोपयोगी ऐसे बन जाते हैं, जैसे कि स्वभावतः मरणहेतु विषय रसायनशाम्त्रों मेँ दर्शित
उपायरूप प्रतिकल्पना से विषपने को छोड़कर अमृतरूप बन जाता है