Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 33, Verses 32–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 33, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मणो निःस्वभावस्य सर्गसंवेदने स्वतः ।
स्पन्दने पवनस्येव कारणं नोपयुज्यते ॥ ३२ ॥
स्वप्नानुभववद्भ्रान्तिर्ब्रह्माब्धौ ब्रह्मवीचयः ।
सर्गता वस्तुतस्त्वत्र न स्वप्नो न च सर्गता ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मा की जो बहिर्मुखता है, वह निथ्याभ्रुत अविद्या का ही विलास है, नकि सत्यरुप ब्रह्म के
स्वभाव से उत्पन्न है, यह कहते हैं /
हे भद्र, जिसमें किसी तरह का कोई स्वभाव ही नहीं है, उस ब्रह्म में अपने को सृष्टि का जो ज्ञान
होता है, उसमें पवन के स्पन्दन की नाई, कोई कारण ही नहीं है, केवल अज्ञान ही है