Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 34, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
प्राप्तेषु सुखदुःखेषु यो नश्यति स नश्यति ।
यो न नश्यत्यनाशोऽसावलं शास्त्रोपदेशनैः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
यह अहक्रात्मक जयत् द्रष्टिकृप केदन से उत्पन्न हुआ है, अतः अद्नष्टिरृप अवेदन से
बलह्मचिति में लीन हो जाता हैं, यों जो पहले कहा गया था, उसमे युक्तियों को दिखलाने की इच्छा
से महाराज वस्निष्ठजी सबसे पहले विनाशशील दुःखादि तरिपुटियों से अलगरकर आविनाशशील
आत्मा को दिखलाते हुए (नम्पूर्ण शास्त्रों की सफलता आत्मा के दर्शन से ही है“ यह कहते हैं ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामचन्द्रजी, सुख-दुःखों के आने पर जो नष्ट हो जाता
है वही नष्ट होता है और जो नष्ट नहीं होता, वही यह अविनाशी आत्मा है, बस, इससे और
अधिक शास्त्रों का उपदेश करना व्यर्थ ही है
सर्ग सन्दर्भ
तैंतीसवाँ सर्ग समाप्त चोंतीसवाँ सर्ग दृष्ट पदार्थो की सृष्टि टी जगत् है, यह जगत् अदर्शन से ही नष्ट हो जाता है, इस प्रस्तुत विषय में युक्तियों का वर्णन।