Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 34, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
एकात्मैवोदये ज्ञप्तेर्नानातामिव चागतः ।
अज्ञानात्स त्ववस्तुत्वात्प्रेक्षितो नोपलभ्यते ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
अनेकरूप-
सा होकर आया हुआ एक आत्मा ही दृष्टि के अज्ञान से विवर्तरूप उदय है यानी संसार है । यह
संसार स्वयं अवस्तुरूप होने के कारण तत्त्वदृष्टि से भलीभाँति देखा गया भी प्राप्त नहीं किया जा
सकता