Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 34, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
न जगत्सन्न चैवासद्भासते चेतनाच्चिति ।
अचेतनान्न कचति क इवार्थग्रहोऽत्र नः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, जगत् न सत् है ओर न असत् है, केवल चितिशक्ति में बहिर्मुखवृत्ति के
कारण भासता है यदि बहिर्मुखवृत्ति का त्याग हो जाय, तो वह भासता ही नहीं, इसलिए हम लोगों
को इन विषयों के लिए आग्रह ही क्या ?