Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 34, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
सर्वेश्वरत्वादीशस्य विभातीदं प्रचेतितम् ।
अचेतितं च नो भाति तेनाचेतितमस्तु ते ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
वर्णित द्ृष्टिछृष्टि कल्पनाओं का अनुवाद कर फलित कहते हैं /
सर्वेश्वर होने के कारण यानी माया शबल होने के कारण ही ईश में प्रचेतित (दृष्ट) हुआ
यह संसार भासता है और अचेतित (दृष्टि न हुआ) नहीं भासता है । इसलिए आपको यह
जगत् सदा अचेतित ही रहे