Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 34, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
वेदनं बन्धनं विद्धि विद्धि मोक्षमवेदनम् ।
यथास्थितं यथाचारं भव शान्तमवेदनम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, बाह्य पदार्थों के ज्ञान को
बन्धन और बाह्य पदार्थो के अज्ञान को मोक्ष जानिये इसलिए आप भूमिका के अभ्यासरूप
विद्वानों के आचरण का उल्लंघन न कर यथास्थित शान्त अवेदनरूप हो जाइये