Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 34, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
ज्ञप्तिरप्यात्मभूतैव सर्वं भाति हि तन्मयम् ।
तस्मात्साहं जगत्सर्वमभिन्नं परमात्मनः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
यह ठीक है, परन्तु अदर्शनमात्र से दृश्य की शान्ति कैसे हो सकती है 2 इस पर कहते हैं ।
जैसे सामने ही रहनेवाले, परन्तु अन्तर्धानशक्ति से अदृष्ट बड़े-बड़े सिद्ध पुरुषों का एवं
पिशाचों का व्यवहार आदि भयंकर होता हुआ भी दिखाई नहीं पड़ता अथवा जैसे एक ही शयन पर
सोये हुए दो पुरुषों मे एक को स्वप्न में जोर से हुए मेघगर्जन को दूसरा पुरुष नहीं जान पाता यानी
वह हम लोगों की दृष्टि से है ही नहीं, वैसे ही यहाँ पर भी जान लीजिये अर्थात् चूँकि अपनी दृष्टि
में नहीं आता, इसलिए पुरुष सामने स्थित सिद्ध व्यवहार को नहीं देख पाता, क्योंकि सभी का यह
स्वभाव है कि अपनी दृष्टि में आनेवाले पदार्थ का सब अनुभव करते हैं ॥७.८॥
इससे अपनी इन बातों में क्या आया, इस प्रश्न पर कहते हैं /
ज्ञप्ति पदार्थ भी आत्मरूप ही है, अतः जो कुछ दीखता है, वह तद्रूप ही दीखता है । इससे
अहंकार के सहित सम्पूर्ण जगत् परमात्मा से अभिन्न है