Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 35, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
अहमेवानहंभावमनहं वाऽहमेव च ।
अन्यदेव तदेवाहमहमेवान्यदेव तत् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
अनहंभाव (युष्मदर्थ का विषय) होने पर भी अहंभावरूप तथा अहंभावरूप से भासित होने पर भी
वह अनहंभावरूप एवं इदमर्थ का विषय अन्यरूप होने पर भी वह आत्मरूप ही है तथा अहंरूप
(आत्मरूप) होने पर भी वह ब्रह्म अन्य के समान स्थित है