Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 35, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
उद्यन्त्यमूनि सुबहूनि महामहान्ति सर्गागमप्रलयजन्मदशा जगन्ति ।
सर्वाणि तान्ययमपारस्वरूप एव प्रस्पन्दनानि मरुदेव यथास्व शान्तम् ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
परिणामतः महान
होते हुए भी जो काल, देश और वैभव आदि से भी महान् हैं उन अनेक महामहाब्रह्माण्डों के तथा
उनके भीतर अनेक तरह के पदार्थों की सृष्टि, स्थिति और प्रलय एवं उनके भीतर प्राणियों के जन्म
बाल्य, यौवन आदि अवस्थाएँ, जाग्रतादि दशाएँ तथा उत्कर्ष ओर अपकर्ष की दशाएँ-ये सबके सब
इस चिदाकाश में उदित होते-रहते हैं । वे सभी अपरिच्छिन्नस्वरूप इस चिदाकाश के ही रूप हे,
जैसे कि वायु के सभी स्पन्दन वायुरूप ही है, वायु से भिन्न किसी दूसरी वस्तु के स्वरूप नहीं है ।
हे श्रीरामजी, ऐसे समझकर आप शान्त स्थित रहिये