Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 36, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
यस्य न स्वदते दृश्यमदृश्यं स्वदते हृदि ।
सबाह्याभ्यन्तरं शान्तः स वितीर्णो भवार्णवात् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसे यह दृश्यप्रपंच नहीं रुचता और चिन्मात्र
अदृश्य ब्रह्म ही अपने हृदय के भीतर रुचता है वह बाह्य ओर आभ्यन्तर से शान्तमुनि संसार सागर
से मानों पार हो गया