Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 36, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
जिघ्र्यन्तां गन्धपुष्पाणि विगतेच्छमवासनम् ।
स्पन्दबन्धोपलग्नानि त्यागाय वनवातवत् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
इच्छा
और वासनाओं से रहित होकर पघ्राणेन्द्रिय के नजदीक ले जाकर गन्धप्रचुर पुष्पों को, वनवायु के
सदृश, त्याग के लिए सूँघते रहें