Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 36, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
बालचिन्ता पुरोव्योम्नि न किंचिदपि मे यथा ।
तथेदं तत्त्वतो विश्वं सत्यं तु शिशुचेतसि ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रसिद्ध आकाश में गालदुद्धिवेय यक्ष, पिशाच आदि का भीषणरूप तथा बुद्धिमान् पुरुषों की
बुद्धि से के शर्ध रुप दृष्टान्तरुप से प्रसिद्ध ही है यह कहते हैं ।
हे श्रीरामजी, बालक के चिंतन से कल्पित यक्ष, पिशाच आदि का रूप जैसे सामने आकाश
में प्रौढ़ विद्वान् की दृष्टि में कुछ भी नहीं है वैसे ही मुझ विद्वान् की दृष्टि में तत्त्वतः यह सारा
विश्व कुछ भी नहीं है । परन्तु यही संसार अज्ञानियों की दृष्टि में सत्य प्रतीत होता है