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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 36, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

रूपालोकमनस्कारा सारश्चिन्मात्रतां विना । न लभ्यतेऽसावपरं व्योमेवात्र क्व विश्वता ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

रुपालोक ओर मनन आदि का यानी बाह्य ओर आभ्यन्तर सवका तत्वतः विचार करने पर जब विन्मात्र से अतिरिक्त रूप ही दुर्लभ है तब इनसे विश्वता की निद्धि तो बहुत दूर ही है, यह कहते हैं। विचार कर देखने से रूपालोक और मनस्कार अर्थात्‌ बाह्य एवं आभ्यन्तर सब पदार्थों का सार चिन्मात्र ही है । क्‍योंकि चिन्मात्र से अतिरिक्त, द्वितीय आकाश की नाई, वह उपलब्ध नहीं होता । इसलिए यहाँ विश्वता (संसारता) ही कहाँ ?