Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, Verses 32–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 38, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
दीपनिर्वाणनिर्वाणमस्तंगतमनोगतिम् ।
आत्मन्येव शमं यातं सन्तमेवामलं विदुः ॥ ३२ ॥
आबुद्ध्यादि जगद्दृश्यं यस्मै न स्वदते स्वतः ।
आकाशस्येव शान्तस्य तमाहुर्मुक्तमुत्तमाः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसके मन की गति अस्त हो चुकी है
और जो आत्मा में शान्त है उसके ब्रह्मरूप से विद्यमान रहते हुए भी विद्वान् लोग दीपनिर्वाण की
नाई उसको निर्मल निर्वाण समझते हैं