Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 38, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 38, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
अक्षुब्धखानिलालोकजलभूशान्तिशालिनी ।
तता शून्या महारम्भा ब्रह्मसत्तैव सर्वतः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
जब सम्पूर्ण प्रपंच विदेकरत है, चिति निरन्तर ही अश्चुन्ध हैं और समस्त विशेषणों से निर्युक्ति
है, तब क्षुब्ध हुए आकाश आदि पवर्तो की भी शान्ति अर्थतः चिद्ध हो जाती है, उससे अन्त में
पूर्णव्रह्मरूपता ही बच यह यह कहते हैं /
क्षोभशून्य तथा आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी से शून्य एवं पूर्णशान्ति से विराजमान,
बड़े-बड़े आरम्भों से युक्त, वास्तव में शून्यरूप ब्रह्मसत्ता ही चारों ओर विस्तृत है