Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
विद्धि चिन्मात्रमेवेदमसद्रूपोपमं ततम् ।
तेनालं मौनमास्स्वैवं सर्वं निर्वाणमात्रकम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, यह जो प्रपंच दिखाई दे रहा है, वास्तव में उसे चिन्मात्र ही समझिये ।
स्वरूपतः विस्तृत प्रपंच असत् खरगोश के सींग के सदृश ही है, इसलिए आप जगत् के विषय में
समस्त वाग्व्यवहार को छोड़कर चुपचाप बैठे रहिये, क्योंकि पूर्वोक्त प्रणाली से सब कुछ परिशिष्ट
आत्मस्वरूप ही है