Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
नाहमस्मीति बुद्ध्वापि सोपपत्तिकमप्यलम् ।
जानानो ज्ञप्तिमात्रं च किमज्ञ इव मुह्यसि ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
“भें देहादि विषयरूप नहीं हूँ, ऐसा जानते हुए ओर अनेक तरह
की युक्तियों से ज्ञानरूप सुख का अच्छी तरह अनुभव करते हुए भी क्यों आप अज्ञानी के सदृश
मोह में फँसते हैं अर्थात् नहीं ही फँसना चाहिए