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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

अहन्त्वं पवने स्पन्द इव यत्त्वयि संस्थितम् । परमात्मनि तन्नान्यदेतत्स्पन्द इवानिले ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

पवन में स्पन्दन के सदृश आपमें जो अहन्ता स्थित है वह आपके परमात्मस्वरूप बन जाने पर वायु में स्पन्दन के सदृश आपसे पृथक्‌ नहीं रह सकती