Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
अहमर्थः परे वायौ स्पन्दस्तत्प्रशमे तु तत् ।
अनिर्देश्यमनाभासमनन्तमजमव्ययम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
परमात्मारूप
वायु में अहंकाररूप स्पन्द है । उसे शान्त होने पर अनिर्देश्य, अनाभास, अज और अविनाशी
अद्य चिदाकाशमात्र शेष रहता है