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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

अहमर्थे प्रविसृते संसारो ह्यनुभूयते । नान्तर्भूय परिक्षीणे लोचनस्येव तारके ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

सांसारिक पदार्थों का अनुभव नहीं कर पाती; वैसे ही अहमर्थ के प्रसृत होने पर ही यह संसार अनुभूत होता है, अन्यथा नहीं