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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

अहमंशे विदा क्षीणे सर्वमेव क्षयं गतम् । न किंचिच्च क्वचित्क्षीणं निर्वाणैकघनं स्थितम् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्त्वबोध के द्वारा अहमंश के क्षीण हो जाने पर (हे श्रीरामजी, यह आप समझ लीजिए कि) ममता का आधार सारा संसार ही विनाश को प्राप्त हो गया । (छक जगत्‌ का नाश होने पर सर्वस्व नाश की आशंका से डरे हुए पुरुष के प्रति समाधान देते है ८) ओर सच पूछिये तो यथार्थ में कहीं कुछ भी नष्ट नहीं हुआ । क्योंकि सर्वत्र आनन्दघन एक आत्मा ही स्थित हे