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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 4, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 4, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

अहंनाहमिति भ्रान्तिर्न च चित्त्वादृतेऽस्ति सा । चित्त्वं चाकाशविशदमतः क्वैषा भ्रमस्थितिः ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

अनहांबुद्धि भी तो अहंबुद्धि की नाई दैतरूप होने के कारण अध्यास की है, फ़िर वह किससे शान्त होती हैं, यदि यह पूछिये, तो इसका उत्तर यह है कि पक के साथ कत्कश्रूलि की नाई अल्वुदि के साथ वह भी अपने-आप चिदात्मा में शान्त हो जाती है, यह उपपत्तियूर्वक कहते हैं / मैं देहादि नहीं हूँ, किन्तु चिन्मात्ररूप ही हूँ, इस बुद्धि को भी यदि आप द्वैतभ्रमबुद्धि ही कहें, तो यह परमार्थचित्स्वभाव को छोड़कर और कुछ नहीं है । क्योंकि चितिस्वरूप तो आकाश के समान विशद है, इसलिए इसमें भ्रम की स्थिति ही कहाँ रह सकती है