Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 40, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 40, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 40 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
यदा स्वभावविश्रान्तिः स्थितिमेति शमात्मिका ।
जगद्दृश्यं तदा स्वप्नः सुषुप्त इव शाम्यति ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
अब व्यतिरेक दिखलाते हैं ।
जब आत्मरवरूप के ज्ञान से शान्तिरूप आत्म-विश्रान्ति अपनी स्थिति प्राप्त करती है अर्थात्
ब्रह्मस्वरूप में जब शान्तिरूप विश्रान्ति प्राप्त हो जाती है, तब यह जगद्-रूप दृश्य ऐसे शान्त हो
जाता है, जैसे सुषुप्ति में स्वप्न