Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 41, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 41, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
अस्वभावस्थितैवास्य कारणं कारणात्मकम् ।
असुषुप्तं स्थिता स्वापे स्वप्नस्येव सतीव सा ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
सुषुप्ति के अवसर में
सुषुप्ति-स्वभाव में स्थित न हुई चिति स्वप्न की जैसे कारण बन जाती है वैसे ही अस्वभाव में
(अविद्या में) स्थित हुई यह चिति ही इस नृत्य की कारण बन गयी है । हे श्रीरामचन्द्रजी, इसी तरह
का कारणात्मक ब्रह्म श्रुतियों मे प्रसिद्ध है