Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 41, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 41, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
सत्यं सत्ये स्थितं शान्तं सर्गात्मन्यात्मनि स्वयम् ।
आकाशकोशसदृशं शिलाजठरसंनिभम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, वस्तुतः सृष्टिरूप में स्थित होने पर भी आकाशकोश के सदृश
शान्त एवं सत्य आत्मा ही अपने सत्यस्वरूप में पत्थर के उदर के सदुश स्वयं स्थित है