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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 41, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 41, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

यत्रादित्यो भवेत्तत्र यथालोकस्तथा भवेत् । परं विषयवैरस्यं तत्र यत्र प्रबुद्धधीः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

वह विद्या तो तत््वज्ञें के साथ निरन्तर समागम रखने से उत्पन्न विवेकज्ञान जनित वैराग्य से ही सिद्ध होती ह इस आशय से कहते हैं / जैसे जहाँ सूर्य होंगे वहाँ प्रकाश अवश्य होगा, यह जैसे अकाट्य सिद्धान्त है, वैसे ही जहाँ विषयों से पूर्णतया वैराग्य होगा, वहाँ अवश्य तत्त्वज्ञानरूप प्रकाश होगा