Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 42, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
तदनन्तात्म चिद्रूपं चेत्यतामिव भावयत् ।
स्वसंस्थमेव ज्ञेयत्वमज्ञत्वमिव गच्छति ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्तीमे अनादि अविद्या आदि ्श्यग्रयव का अध्यास होता है, यह कहते हैं ।
अनन्तस्वरूपचेतनात्मक वही अपने आपको विषयस्वरूप-सा समझता हुआ यानी भावना
करता हुआ स्वस्वरूप में स्थित ही विषयरूप एवं अज्ञानी-सा बन जाता है