Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 42, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
तथा महाचितोच्छायाः सर्गसंवित्तिवृत्तिषु ।
नित्यं सत्त्वमसत्त्वं वा हेतोरन्यानपेक्षणात् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
तथा महाचैतन्य के संकल्प से जायमान एवं निरन्तर ब्रह्मसत्ता के बल पर अपनी सत्ता
रखनेवाले सृष्टि-भ्रमों में महाधिष्ठानभूत ब्रह्म की अपेक्षा से सदा सत्ता है और स्वरूपतः असत्ता
है । इस तरह का निरूपण "सदेव सोम्येदम.' इत्यादि श्रुति में है। इस विषय में दूसरे किसी तर्क की
अपेक्षा नहीं है