Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 42, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
कटकत्वस्य भिन्नस्य विश्वस्य च तथा परे ।
द्वित्वैक्यासंभवे चात्र कार्यकारणता कुतः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
परन्दु यह तब होता, जब कि कार्य और कारण का भेद पभ्रिद्ध होता, लेकिन वही सिद्ध
नहीं है, यह कहते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी, द्वित्व ओर एेक्य के ही असम्भव से यहाँ न कोई कार्यरूप है ओर न कोई
कारणरूप ही है । (यदि काल्पनिक कार्यकारणभेद मान लिया जाय, तो भी काल्पनिक भेद
से सत्यता का निर्वाह नहीं हो सकता, यह कहते हैं /) यदि काल्पनिक कार्यकारणभेद मान
लें तो भी परमात्मा से भिन्न यह संसार एकमात्र काल्पनिक ही सिद्ध होगा, इससे उस परमात्मा
से भिन्न दूसरी वस्तु सिद्ध नहीं होगी