Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verses 23–24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 42, verses 23–24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 23,24
संस्कृत श्लोक
कथमव्योमता व्योम्नि द्वितीयासंभवाद्भवेत् ।
प्रतिभात्मैव भारूपो भाति सर्गो महाचिति ॥ २३ ॥
पुत्रिकेवोपलोत्कीर्णा तन्मयत्वात्तदात्मिका ।
साधो यथास्थितस्यैवं बुद्ध्वा विश्वं प्रलीयते ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी , प्रतिभारूप
ही यह सृष्टि प्रतिभारूप से महाचेतन में ऐसे भासती है, जैसे पाषाण में खुदी हुई प्रतिमा
पाषाणरूप होने के कारण पाषाणमय भासती है । हे साधो, यथार्थभूत वास्तविक ब्रह्म का
तत्त्वज्ञान हो जाने से इस विश्व का विलय हो जाता है ओर बाह्य तथा आभ्यन्तर सब चेष्टाओं
से शून्य अवस्था के द्वारा स्फुरित हो रहा ब्रह्म ही सम्पूर्ण संसारभ्रम को नष्ट करके अवशिष्ट
रह जाता है