Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 42, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
आकाशकोशविशदा भवता भवभूमयः ।
यथास्थितं च तिष्ठन्ति गच्छन्तश्च यथागतम् ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानी
पुरुष अपनी इच्छा के अनुसार जहाँ चाहे स्थित रहते हैं और जहाँ जाने की इच्छा होती है,
बड़े आनन्द से वहाँ चले जाते हैं। वे एकमात्र प्रारब्धप्राप्त अपना कर्म करते हुए परब्रह्म
परमात्मा के स्वरूपभूत बन जाते हैं