Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 42, Verses 48–49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 42, verses 48–49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 48,49
संस्कृत श्लोक
निर्वाणं वर्णयन्नज्ञस्ताप्यतेऽन्तर्न शाम्यति ।
कल्पनांशोपदेशेन लोकोऽविद्यामयात्मना ॥ ४८ ॥
येन केनचिदज्ञत्वात्कृतार्थोऽस्मीति मन्यते ।
अकृतार्थः कृतार्थत्वं जानन्मौर्ख्यविमोहितः ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
अन्धयोलांयूल न्याय से असद् उपदेश से ठगे यये पुरुषों में भी कृतार्थता की भान्ति होती हैं,
यह लोक में प्रसिद्ध हैः यह कहते हैं ।
अविद्यास्वरूप जिस-किसी काल्पनिक उपदेश से कोई पुरुष “मे कृतार्थ हूँ” यों यदि मानता
है, तो वह अज्ञानी होने के कारण असल में अकृतार्थ ही है। अपने में कृतार्थता जान रहा वह मूर्खता
से अत्यन्त मोहित है। ऐसा पुरुष दूसरे क्षण में अनेकविध यातनाओं के कारण अपनी अकृतार्थता
ही जान पायेगा